संगठन : ताकत, सोच और जमीन से जुड़ाव
September 25, 2026
पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व, सामाजिक संगठन और राजनीतिक संगठन, इन तीनों मोर्चों पर काम करने और कुछ हद तक नेतृत्व करने का मौका मिला। इसी वजह से संगठन को मैं तीन अलग-अलग नजरिए से देख पाया हूं। समाज की नजर से, कार्यकर्ता की नजर से, और एक व्यापक राजनीतिक ढांचे की नजर से। मेरी यह समझ किताबों से नहीं बनी, यह बनी है जमीन पर मिले अनुभवों से, कभी कामयाबी से तो कभी नाकामी से, और लगातार बदलती परिस्थितियों से।
कॉर्पोरेट लीडरशिप में रहते हुए और अलग-अलग मुल्कों में काम करने के बाद एक बात साफ हुई ~ किसी भी संस्था की कामयाबी आखिर में साफ मकसद, सक्षम टीम, जवाबदेही, आपसी संवाद और बदलते हालात के साथ ढल जाने की क्षमता पर टिकी होती है। नेतृत्व का मतलब सिर्फ फैसले लेना नहीं है, इसका असली मतलब है अलग-अलग तरह के लोगों को साथ लेकर चलना, और हर जगह की अपनी सच्चाई का सम्मान करते हुए एक साझा मकसद को नतीजों में बदल पाना।
मैं 2019 से बड़े राजनीतिक संगठन का हिस्सा हूं, और बीते वर्षों से गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने की जिम्मेदारी भी निभा रहा हूं। GASS को एक सक्रिय और नतीजे देने वाला सामाजिक संगठन बनाते हुए organisation building को मैंने बहुत करीब से देखा और जिया है, इसलिए यह लेख किसी संगठन पर की गई टिप्पणी नहीं है, यह तो बस मेरे अपने सामाजिक और राजनीतिक सफर से सीखी बातों का निचोड़ है।
मेरे अनुभव में संगठन की असली ताकत न पद में होती है, न दफ्तर में, न संसाधनों में। असली ताकत इस बात में छिपी है कि संगठन कितने लोगों को एक मकसद से जोड़ पाता है, कितनों के कंधों जिम्मेदारी ले पाते हैं, और जब वक्त आए तो कितने लोग बिना बुलाए, खुद-ब-खुद जमीन पर आकर खड़े हो जाते हैं। संगठन दरअसल सिर्फ एक ढांचा नहीं है, यह एक मकसद के इर्द-गिर्द लोगों का जुड़ना और लामबंद होना है।
ढांचा भी चाहिए, जान भी
ढांचा जरूरी है, इसमें कोई शक नहीं। राष्ट्रीय, प्रदेश, जिला, मंडल और स्थानीय स्तर पर हर किसी की जिम्मेदारी साफ-साफ तय होनी चाहिए। लेकिन सच यह भी है कि सिर्फ ढांचा खड़ा कर देने से संगठन नहीं बनता, उसमें जान तो कार्यकर्ता या सदस्य ही डालता है। कोई भी पदाधिकारी तभी काम का है जब वह लोगों के बीच दिखे, कार्यकर्ताओं से जुड़े, उनकी समस्याएं समझे और आखिर में कुछ नतीजा भी दे।
मैं संगठन को अक्सर दो स्तरों पर देखता हूं। एक ऊपर-नीचे की, यानी vertical structure, जहां राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक जिम्मेदारी और coordination का सिलसिला चलता रहता है। दूसरा, फैलाव वाला, यानी horizontal spread, जिसमें अलग-अलग सामाजिक समूह, युवा, महिलाएं, प्रोफेशनल्स और तरह-तरह के विषयों से जुड़े लोग शामिल होते हैं। असली ताकत तब आती है जब ये दोनों समन्वय के साथ चलते हैं।
अपने FMCG डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल के तर्ज पर मैं इसे अक्सर hub-and-spoke मॉडल की तरह समझाता हूं। केंद्रीय नेतृत्व दिशा और ढांचा देता है, और प्रदेश, जिला व स्थानीय इकाइयां उसे जमीन तक पहुंचाती हैं। पर यह process तभी काम करता है जब बात सिर्फ ऊपर से नीचे न बहे। जब नीचे से जो सूचना, feedback और असली जमीनी हालात ऊपर आते हैं, तभी feedback mechanism ‘closed loop’ में काम करता है , यह किसी भी संगठन के लिए सबसे ज़रूरी है। मेरी नज़र में clouded / biased feedback mechanism is a recipe for disaster.
कॉर्पोरेट लीडरशिप और बाहर के अनुभवों ने यही सिखाया कि कोई भी केंद्रीय ढांचा तभी असर दिखाता है जब उसे स्थानीय हालात के हिसाब से ढाला जाए। दिशा एक हो सकती है, साझा हो सकती है। पर उसे जमीन पर उतारने के लिए स्थानीय समझ, लचीलापन और अपनापन चाहिए ही चाहिए।
जमीन से जुड़ाव और हर इलाके की अपनी सच्चाई
GASS में काम करते हुए मैंने बार-बार महसूस किया कि सबसे जरूरी जानकारी अक्सर सबसे नीचे ही मिलती है, अंग्रेजी में एक कहावत है “keep an ear to the ground” । गांव का कार्यकर्ता लोगों की सोच सबसे पहले भांप लेता है, तहसील स्तर का कार्यकर्ता किसी मुद्दे का असली असर समझता है, और जिला नेतृत्व इन सारे अनुभवों को आपस में जोड़ पाता है। राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका बस इतनी है कि इन सबको मिलाकर एक बड़ी रणनीति गढ़ सके ~ यही वजह है कि मैं बूथ या गांव की इकाई को संगठन का आखिरी छोर नहीं मानता ~ मेरे लिए वह उसका सबसे संवेदनशील सेंसर है, जहां से असली नब्ज पकड़ में आती है।
राजस्थान में तो यह बात और भी मायने रखती है। पश्चिमी राजस्थान से लेकर मेवाड़, वागड़, हाड़ौती, शेखावाटी, ढूंढाड़ और पूर्वी राजस्थान तक जाते-जाते सामाजिक और आर्थिक हालात पूरी तरह बदल जाते हैं। गांव की समस्या अलग है, शहर की अलग, और हर समूह की अपनी उम्मीदें भी अलग हैं। इसलिए राजस्थान में संगठन चलाने का मतलब सिर्फ जयपुर में बैठकर फैसले लेना नहीं हो सकता। नेतृत्व को गांव तक जाना ही होगा, और गांव की बात जयपुर तक भी लानी होगी। दोनों तरफ से रास्ता खुला रहना चाहिए – it has to be a two way street !
सिर्फ गतिविधि नहीं, नतीजा चाहिए
एक और बात जो अनुभव ने सिखाई, वह यह कि result-oriented organisation और activity-oriented organisation में जमीन आसमान का फर्क है।
बैठकें होना, पोस्टर लगना, सोशल मीडिया पर पोस्ट डलना, कार्यक्रम होना, ये सब activity हैं, बस इतना ही है, ये तभी असली मायने में organisation बनते बनाते हैं जब इनका नतीजा कहीं दिखे। लोगों तक पहुंच बढ़े, नए कार्यकर्ता तैयार हों, समाज में कोई संवाद शुरू हो, या किसी असली समस्या का हल निकले।
मेरे लिए संगठन को परखने की सबसे बड़ी कसौटी बस एक सवाल है ~ What changed because we were there ? अगर हमारी वजह से कोई नया व्यक्ति जुड़ा, किसी युवा को आगे बढ़ने और नेतृत्व करने का मौका मिला, किसी की आवाज पहली बार सुनी गई, या जमीन पर कोई ठोस बदलाव दिखा, तभी मान सकते हैं कि संगठन ने अपना काम किया।
दफ्तर और तस्वीरों में सिमटने का खतरा
आज के दौर में दफ्तर और तस्वीरों से बड़े संगठनों के सामने एक खतरा भी खड़ा होने लगा है, जिसे मैं office-centric politics कहता हूं। दफ्तर में नजर आना, बड़े पदाधिकारियों के साथ तस्वीरें खिंचवाना, मंच पर मौजूदगी, सोशल मीडिया पर presentation, ये सब चीजें धीरे-धीरे किसी व्यक्ति की पहचान का पैमाना बनने लगती हैं, जबकि असल में इनका काम से कोई सीधा रिश्ता नहीं होता। मैं अक्सर कहता हूं कि दफ्तर की तस्वीर संगठन नहीं होती, और सोशल मीडिया पर दिखना कामयाबी नहीं – पद खुद में तो बिल्कुल भी कोई उपलब्धि नहीं है।
जिस दिन किसी संगठन में काम की जगह दिखावे से किसी की अहमियत तय होने लगे, उस दिन असली मेहनत करने वाला कार्यकर्ता पीछे छूट जाता है। मुझे इतने सालों में एक बात समझ आई है जो आज आपके साथ साझा क्र रहा हूँ – Position is Responsibility, It is not Recognition पद बढ़ने का मतलब है ज्यादा काम और ज्यादा जवाबदेही, न कि किसी उपलब्धि का सर्टिफिकेट !
इसीलिए इन्हीं कारणों से मैं मानता हूं कि किसी भी ढांचे के साथ-साथ जमीन पर मौजूदगी, यानी boots on the ground, होनी ही चाहिए। दफ्तर, coordination, टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया, बैठकें, ये सब उपयोगी हैं, पर इनमें से कोई भी जमीन पर मौजूदगी की जगह नहीं ले सकता। संगठन आखिरकार लोगों के बीच ही बनता और पनपता है।
सोचने वाला दिमाग भी चाहिए
Structure साथ-साथ एक think tank और organisational intelligence का होना अत्यंत जरूरी है। किसी भी संगठन के पास मैनपावर होती है, पहुंच होती है, काम को अंजाम देने की ताकत होती है, यही उसकी मांसपेशी है, इसकी brute muscle force; पर सिर्फ मांसपेशी से काम नहीं चलता, मांसपेशी चलाने के लिए उसे दिमाग भी चाहिए। आज के दौर में सिर्फ लोगों को जोड़ लेना काफी नहीं है, साथ में रिसर्च, डेटा, टेक्नोलॉजी, नीतियों की समझ और विशेषज्ञों की भी दरकार है, ज़रूरत है । जमीन से मिली जानकारी को analysis में, और analysis को policy और रणनीति में बदलना होगा, तभी बात आगे बढ़ती है।
मैं इसे एक साधारण सिलसिले की तरह देखता हूं ~ जमीनी जानकारी से रिसर्च, रिसर्च से नीति, नीति से नेतृत्व, नेतृत्व से संगठन, और संगठन से वापस फीडबैक ~ यह चक्र यूं ही चलता रहता है, और यही चीज किसी संगठन को महज एक साधारण ताकत नहीं अपितु एक सोचने-समझने वाली जीवांत ताकत बनाती है।
नेतृत्व, जिम्मेदारी और भरोसा
मैंने अपने वर्षों के कॉर्पोरेट , सामाजिक और राजनितिक experience में देखा है है कि संगठन जितना बड़ा होता जाता है, जिम्मेदारी और जवाबदेही उतनी ही साफ होनी चाहिए। किस इलाके की जिम्मेदारी किसके पास है, नतीजे किस आधार पर मापे जाएंगे, रिपोर्ट किसे देनी है, यह सब स्पष्ट रहना जरूरी है। पर साथ ही यह भी जरूरी है कि संगठन इतना कड़ा न हो जाए कि स्थानीय नेतृत्व खुद कुछ करने की हिम्मत ही खो बैठे – delicate balance is essential. ढांचा भले ऊपर से बनकर आए, ऊर्जा हमेशा नीचे से ही पैदा होती है – यह छोटी से लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिये।
यही कारण है की मुझे लगता है संगठन सिर्फ अनुशासन का नाम नहीं, बल्कि एक तरह की अनुशासित भागीदारी है, कार्यकर्ता को नेतृत्व की दिशा समझनी चाहिए, लेकिन साथ ही उसे यह भी महसूस होना चाहिए कि जमीनी हकीकत को ऊपर तक पहुंचाना भी उसी की जिम्मेदारी है।उन्हें नेतृत्व को फैसले लेने का हक तो है, पर सुनने की आदत भी उतनी ही जरूरी है।
एक बड़े संगठन की ताकत और कमजोरी
बड़े संगठनों की एक तरह की SWOT analysis भी की जा सकती है, मैं यह कार्य हर छह माह में करता हूँ। संगठन की सबसे बड़ी ताकत / strength है इसका कैडर, इसकी पहुंच, इसकी संस्थागत निरंतरता और जमीनी नेटवर्क, ताकत बनते बनते यही विशालता कमजोरी / weakness भी बन सकती है, अगर संगठन जमीनी हकीकत से कटने लगे, या पद और बैठकें ही असली काम की जगह ले लें। इसका सबसे बड़ा मौका / opportunity है टेक्नोलॉजी, AI, डेटा, युवा प्रोफेशनल्स और policy research को grassroots से जोड़ना। और खतरा / threat वहां से आता है जहां संतोष, व्यक्ति-केंद्रित राजनीति, आपसी प्रतिस्पर्धा, गलत सूचनाएं और दफ्तर-केंद्रित संस्कृति पनपने लगती है।
मुझे लगता है सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संगठन कहीं अपनी ही सफलता का कैदी न बन जाए, किसी ने सही कहा था Good is the enemy of Greatness, जितना विस्तार हो, जमीन से जुड़ाव उतना ही मजबूत होना चाहिए। पद बढ़ें तो जिम्मेदारी भी बढ़े, दफ्तर बढ़ें तो फील्ड में मौजूदगी भी उतनी ही बढ़े, और सोशल मीडिया की पहुंच बढ़े तो असली सामाजिक जुड़ाव भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए, वरना यह विस्तार सिर्फ ऊपरी दिखावा रह जाता है।
तस्वीरें बढ़ने से संगठन बड़ा नहीं होता, कार्यकर्ता बढ़ने से संगठन बड़ा होता है, और कार्यकर्ताओं की गिनती से भी ज्यादा मायने रखती है उनकी क्वालिटी, उनकी प्रतिबद्धता और उनकी साख ~ यही किसी संगठन की असली पूंजी है।
अलग-अलग अनुभवों से एक जैसा सबक
Organisation building को लेकर मैंने जो सबसे बड़ा सबक सीखा है, वह यही है कि ढांचा ऊपर से खड़ा किया जा सकता है, पर संगठन जिंदा नीचे से ही रहता है।
सामाजिक संगठन के काम ने सिखाया कि समाज को साथ लिए बिना कोई भी आंदोलन ज्यादा दिन नहीं चल पाता। सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व ने समझाया कि लोगों की भावनाओं और उम्मीदों को समझना उतना ही जरूरी है जितना उन्हें रास्ता दिखाना। राजनीतिक संगठन से structure, discipline, scale और institutional continuity की अहमियत समझ आई। और कॉर्पोरेट लीडरशिप तथा बाहर के अनुभवों ने सिखाया कि diversity, accountability, adaptability और टीम पर भरोसा, ये सब किसी भी बड़े संगठन की लंबी उम्र के लिए जरूरी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इन सारे अनुभवों का सार अलग-अलग नहीं निकलता। ये एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं, एक-दूसरे के पूरक हैं।
2019 से राजनितिक प्रवेश के पश्चात नजदीक से राजस्थान के विभिन्न राजनितिक संगठन का अध्ययन करने के बाद, और वर्षो से GASS का नेतृत्व संभालते हुए एक बात मेरे लिए और साफ हुई है ~ व्यक्ति जरूरी है, पर संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है। नेता बदलते हैं, पद बदलते हैं, हालात बदलते हैं, पर एक मजबूत संगठन हर बार नया नेतृत्व पैदा कर सकता है और वक्त के साथ खुद को फिर से गढ़ सकता है। After all – You are nothing but a seed of your own tree !
आखिर में
In a nutshell ~ पद मिल जाता है, पर उसे साबित हर दिन करना पड़ता है, तस्वीर तो खींची जा सकती है, पर पहचान सिर्फ काम से बनती है। संगठन structure से खड़ा होता है, मगर जिंदा रहता है अपने कार्यकर्ताओं / सदस्यों की वजह से ~ संगठन तभी मजबूत रह पाता है जब उसके boots जमीन पर टिके हों, दफ्तर की कुर्सियों और पायदानों पर नहीं।
मैंने संगठन को किताबों से कम, जमीन से ज्यादा सीखा है, निसंदेह धरातल ने यही सिखाया है कि किसी भी ढांचे की असली ताकत उन लोगों में बसती है जो बिना शोर मचाए, चुपचाप लगे रहते हैं।
संगठन की असली पहचान उसके दफ्तरों में नहीं मिलती, वह मिलती है उसके कार्यकर्ताओं के पैरों पर जमी धूल में।
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